परियोजना पृष्ठभूमि

अंतिम नवीनीकृत: 16/11/2012

हिमाचल प्रदेश पश्चिमी हिमालय के निचले भाग पर स्थित 556,700,000 हेक्टेयर के क्षेत्रफल और लगभग 6 लाख की आबादी वाला एक पहाड़ी राज्य है. राज्य में कार्यशील जनसंख्या का लगभग 70% भाग कृषि क्षेत्र में लगा हुआ है, लेकिन कृषि सकल राज्य घरेलू उत्पाद का केवल 18.8% है. कम कृषि उत्पादकता का कारण है कि पहाड़ी राज्य होने के कारण राज्य की केवल 10% भूमि ही कृषि के लिए उपलब्ध है. इस कारण 80% से अधिक किसान छोटे और 2.0 हेक्टेयर से कम भूमि के मालिक हैं. साथ ही केवल 20% कृषि योग्य भूमि के लिए सिंचाई सुविधा उपलब्ध है तथा शेष भूमि वर्षा पर आधारित खेती पर निर्भर है. इस प्रकार राज्य में अधिकतर किसान खाद्यान्नों की पारंपरिक खेती में लगे हैं, तथा सब्जियों और फलों जैसी लाभदायक फसलों की और ध्यान देने में सक्षम नहीं है.

अतः ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि विकास को बढ़ावा देने और कृषि आय बढ़ाने के लिए मौजूदा कृषि योग्य क्षेत्र की उत्पादकता को बढ़ाना आवश्यक है जो कि आत्म - निर्वाह फसलों कों उगाने के बजाय पहाड़ी व ऊंचाई पर स्थित क्षेत्रों में नकदी फसलों जैसे सब्जियों के उत्पादन जैसे विविध कृषि उत्पादन के प्रयासों से संभव है. इस तरह की उपलब्धि के लिए, सिंचाई सुविधाओं, खेतों तक सड़कों और अपर्याप्त विपणन सुविधाओं की कमी जैसी प्रमुख बाधाओं, पर काबू पाना बेहद जरूरी है.

परियोजना के प्रारूप के औचित्य

परियोजना का उद्देश्य हिमाचल प्रदेश राज्य में लक्षित पांच जिलों(बिलासपुर, हमीरपुर, कांगड़ा, मंडी और ऊना) में फसल विविधीकरण कों बढ़ावा देना है. यह लक्ष्य ज़रूरी बुनियादी ढांचे जैसे सिंचाई सुविधाओं और खेत तक सड़कों के विकास के साथ साथ, सब्जी उत्पादन, खाद्यान उत्पादन व कटाई के बाद की तकनीक पर किसानों कों प्रशिक्षण के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है.. इस परियोजना के अंतर्गत क्षेत्र में लगभग 210 सिंचाई योजनाओं में मौजूदा सुविधाओं के नव विकास या पुनः निर्माण  के द्वारा 3712 है. के अतिरिक्त क्षेत्र कों सुनिश्चित सिंचाई उपलब्ध कराया जाएगा तथा147 खेत मार्गों के 100 किमी का निर्माण या सुधार कराया जाएगा. 210 उप परियोजना स्थलों में से प्रत्येक में, फसल विविधीकरण के लिए आवश्यक विधियों, जैसे सब्जियों की खेती, अनाज की खेती और कटाई के बाद प्रौद्योगिकी जैसे विषयों पर किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण दिया जाएगा. प्रत्येक उप - परियोजना में सामूहिक गतिविधियों के लिए जैसे सब्जियों की खेती, उत्पादों का संग्रह और बिक्री और सिंचाई सुविधाओं के रखरखाव और संचालन पर प्रशिक्षण के लिए किसान समूह और स्वयं सहायता समूह का गठन किया जाएगा.